Sunday, March 18, 2012

ग़ालिब का ख़त-11

आज सनीसचर वार को दोपहर के वक्त डाक का हरकारा आया और तुम्हारा ख़त लाया और मैंने पढ़ा और जवाब लिखा और कल्यान को दिया। वह डाक को ले गया। खुदा चाहे तो कल पहुँच जाए। मैं तुमको पहले ही लिख चुका हूँ कि  दिल्ली का कस्द क्यों करो और यहाँ आकर क्या करोगे? बैंक-घर में से खुदा करे, तुम्हारा रुपया मिल जाए।

भाई, मेरा हाल यह है कि दफ्तर शाही में मेरा नाम मुंदरिज नहीं निकला। किसी मुख़बिर ने ब-निस्बत मेरी कोई खबर बदख़ाही को नहीं दी। हुक्काम-ए-वक्त मेरा होना शहर में जानते हैं। फ़रारी नहीं हूँ, रूपोश नहीं हूँ, बुलाया नहीं गया। दारा-ओ-गीर से महफूज़ हूँ। किसी तरह की बाज़ परस हो, तो बुलाया जाऊँ।
मगर हाँ, जैसा कि बुलाया नहीं गया, खुद भी बरू-ए-कार नहीं आया, किसी हाकिम से नहीं मिला, ख़त किसी को नहीं लिखा, किसी से दरख्वास्त-ए-मुलाक़ात नहीं की। मई से पेंशन नहीं पाई। कहो, ये नौ-दस महीने क्यों कर गुज़रे होंगे? अंजाम कुछ नज़र नहीं आता। नहीं कि क्या होगा। ज़ंदा हूँ, मगर ज़िंदगी बबाल है। हरगोबिंद सिंह यहाँ आए हुए हैं। एक बार मेरे पास भी आए थे।
ग़ालि
30
जनवरी 1858 ई. 

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