Sunday, March 18, 2012

ग़ालिब का ख़त-14

रखियो ग़ालिब मुझे इस तल्ख़ नवाई में मुआ़फ़
आज कुछ दर्द मेरे दिल में सिवा होता है


बंदा परवर,
पहले तुमको यह लिखा जाता है किमेरे दोस्त क़दीम मीर मुकर्रम हुसैन साहिब की ख़िदमत में मेरा सलाम कहना और यह कहना कि अब तक जीता हूँ और इससे ज्यादा मेरा हाल मुझको भी मालूम नहीं। मिर्जा हातिम अली साहिब मेहर की जानिब में मेरा सलाम कहनो...




तुम्हारे पहले ख़त का जवाब भेज चुका था, कि उसके दो दिन या तीन दिन के बाद दूसरा ख़त पहुँचा। सुनो साहिब, जिस शख्स को जिस शग्ल का ज़ौक़ हो और वह इसमें बेतकल्लुफ़ उम्र बसर करे, इसका नाम ऐश है। और भाई, यह जो तुम्हारी सुखन-गुस्तरी है, इसकी शोहरत में मेरीभी तो नामवरी है। मेरा हाल इस फ़न में अब यह है कि शेर कहने की रविश और अगले कहे हुए अशआ़र सब भूल गया। 

सब हाँ, अपने हिंदी कलाम में से डेढ़ शेर, यानी एक मुक्ता और एक मिसरा याद रह गया है। सो गाह-गाह जब, दिल उलटने लगता है, तब दस-पाँच बार यह मक्ता़ ज़बान पर आ जाता है।

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'
हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे 


फिर जब सख्त घबराता हूँ और तंग आता हूँ तो यह मिसरा पढ़कर चुप हो जाता हूँ-

ऐ मर्ग-ए-नागहां! तुझे क्या इंतजार है?
यह कोई न समझे कि मैं अपनी बेरौनक़ी और तबाही के ग़म में मरता हूँ। जो दुख मुझको है उसका बयान तो मालूम, मगर उस बयान की तरफ़ इशारा करता हूँ। अँग्रेज़ की क़ौम से जो इन रूसियाह कालों के हाथ से क़त्ल हुए, उसमें कोई मेरा उम्मीदगाह था और कोई मेरा शफ़ीक़ और कोई मेरा दोस्त और कोई मेरा यार और कोई मेरा शागिर्द, कुछ माशूक़, सो वे सबके सब खाक़ में मिल गए।
एक अज़ीज़ का मातम कितना सख्त होता है! जो इतने अज़ीज़ों का मातमदार हो, उसको ज़ीस्त क्योंकर न दुश्वार हो। हाय, इतने यार मरे कि जो अब मैं मरूँगा तो मेरा कोई रोने वाला भी न होगा।  

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