Monday, March 19, 2012

ग़ालिब का ख़त-22

भाई साहब को सलाम पहुँचे। भाई अली बख़्श ख़ाँ और भाई तुर्राबाज़ ख़ाँ और मिर्जा़ ज़ैनउलआबदीन ख़ाँ और मजमुअ़-ए-अहबाब सलाम कहते हैं और पोते होने की मुबारकबाद और उसकी तूल-ए-उम्र व दवाम-ए-ऐश की दुआ़ देते हैं।
बीवी मेरी तुम्हारी बीवी को सलाम और बहू को दुआ़ कहती हैं। और तुमको और ज़किया को प्यार करती हैं। और नसीरुद्दीन को दुआ़ कहती हैं। ये सब बातें तुम्हारे पयाम के जवाब में हैं। तुमने जो लिखा था कि अपने घर में मेरे घर की तरफ़ से सलाम और लड़के वालों की तरफ़ से बंदगी कहना, यह उसका जवाब है। यह जवाब और सब अख़ान-ओ-अहवाब का सलाम और तहनियत कई दिन से मेरे पास अमानत था।
आज जुमा के दिन दोपहर के वक़्त गूना फुर्सत थी कि मैंने यह लिख रखा। अगर जीता रहा तो कल सुबह डाक के वक़्त यह ख़त रवाना करूँगा। इंशाअल्लाह उल -अज़ीज़, मेरा दिल बहुत ख़ुश हुआ कि तुमने शेख़ इकरामुद्‍दीन उर्फ़ अब्दुल सलाम करके लिखा। अल्लाह तआ़ला उसको सलामत रखे और उसे मरातब-ए-आ़ली को पहुँचावे कि वह अपने अब्ब-ओ-जद का नाम रोशन करे और फ़ख़-ए-ख़ानदान हो।
मिर्जा़ हसन अ़ली बेग एक रोज़ मेरे पास आए थे। कहते थे कि मुंशी साहिब चाहते हैं कि तू कोल आवे। मैंने कहा-साहिब, ये दिन जाने के नहीं। अगर ख़ुदा चाहेगा, तो अंबा के मौसम में कोल और मारहरे जाऊँगा। मारहरे के पीरज़ादे के बेटे आए थे। मैंने उनसे भी कह दया है कि कोल बरसात में आऊँगा। अगर भाई ने रुख़्सत दी तो मारहरे भी आऊँगा। 

भाई! तुमने वह औराक़ खो दिए, अब मैं क्या करूँ। अगर वह तुम्हारे पास होते, तो मुझको एक लगाव रहता। और मैं मुशक़्क़त खींचकर, जो कुछ कि अब लिखा है, वह लिखकर तुमको भेज देता। जब मैंने देखा कि तुमको ज़ौक़ नहीं, मेरा भी दिल सर्द हो गया। ख़ैर, यह तो हँसी है। अब तुम वह औराक़ वहाँ से न मँगाओ। मैं हज़रत हुमायूँ का हाल तमाम लिख चुका हूँ। अब अज़-सर-ए-नौ किसी कातिब से लिखवाकर तुमको भेजूँगा।
ख़ातिर जमा रखना। अमीर तैमूर, चार पुश्तें बाद उनके, बाबर तक ऐसी गुज़री कि जिसमें किश्वर कुशाई व लश्करकशी नहीं हुई। बाबर, हुमायूँ इन तीन बादशाह-ए-उलुलअ़ज़्म का हाल ब-सबील-ए इजमाल लिख चुका हूँ। अब हज़रत-ए-अकबर शाह का हाल शुरू करूँगा। नौरोज का हंगामा था और क़सीदे की फ़िक्र थी। इस वास्ते भी नस्र की तरफ़ तवज्जोह नहीं हुई। अभी दो-चार दिन दम ले लूँ, तो अब फिर सरगर्म-ए-कार होकर अकबर शशह का हाल लिखना शुरू करूँ। तुम्हारे वास्ते कातिब-ए-ख़ुशनवीस सही नवीस पैदा करके लिखवाता हूँ। घबराना नहीं।
तफ़्ता का हाल आपने भी लिखा था और उनका ख़त भी आया था। मालूम हुआ कि वह कोल से अकबराबाद को गए। नाच, रंग, शराब व कबाब में महव होंगे।
साहिब, कुछ अशआ़र जानी बाँकेलाल के तफ़्ता ने मेरे पास भेजे और एक ख़त उनका, यानी जानी जी का अकबराबाद से ब-तवसुस्त-ए-तफ़्ता मुझको आया। गरज़ यह है कि नज़्म व नस्र इस शख़्स की मरबूत है। मैं उसको इतना नहीं जानता था। अब आप उससे औराक़ का तक़ाजा़ न कीजिए। मैं आपके वास्ते और भेजे देता हूँ।

18 मार्च 1851
असदुल्ला

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