Sunday, March 18, 2012

ग़ालिब का ख़त-7

भाई,
हाँ मैंने 'जुब्बादातुलाख़बार' में देखा कि रानी साहिब मर गईं। कल एक दोस्त का ख़त अकबराबाद से आया। वह लिखता है कि राजा मरा, रानी नहीं मरी। अभी रियासत का कोई रंग ‍क़रार नहीं पाया। सूरत-ए-इंतज़ाम जानी बैजनाथ के आने पर मौकूफ़ है। यहाँ तक उस दोस्त की तहरीर है, ज़ाहिरा उसको बाबू साहिब का नाम नहीं मालूम। उनके भाई का नाम याद रह गया।
िर्फ उस दोस्त ने ब-तरीक-ए-अख़बार लिखा है। उसको मेरी और 'जानी की दोस्ती का भी हाल मालूम नहीं। हासिल इस तरहरीर से यह है कि अगर यह ख़बर सच है तो हमारे-तुम्हरे दोस्त का नाम बना रहेगा। आमीन, या रब्बुल आलमीन।

साहिब,जयपुर का मुक़द्दमा अब लायक़ इसके नहीं है कि हम उसका ख्याल करें। एक बिना डाली थी, वह न उठी। राजा लड़का है और छछोरा है। रावल जी और सादुल्ला खां बने रहते तो कोई सूरत निकल आती, और यह जो आप लिखते हैं कि राजा तेरे दीवान को पढ़ा करता है और पेश-ए-नजर रखता है। यह भी तो आप अज़ रू-ए-तहरीर-ए-मुंशी हरदेवसिंह कहते हैं। उन का बयान क्योंकर दिलनशीन हो?
वह भी जो बाबू साहिब लिख चुके हैं कि पाँच सौ रुपया नक़द और ख़लहत मिर्जा साहिब के वास्ते तज़वीज़ हो चुका है। होली हो चुकी और मैं लेकर चला, फागुन, चैत, बैसाख, नहीं मालूम होली किस महीने में होती है। आगे तो फागुन में होती थी।
बंदापरवर, बाबू साहिब ने पहली बार मुझको दो हुंडियाँ भेजी हैं, सौ-सौ रुपए की। एक तो मीर अहमद हुसैन मैकश के वास्ते राजा साहिब की तरफ से तारीख़-ए-तव्वुलुद-ए-कंवर साहिब के इनाम में और एक अपनी तरफ़ से मुझको बत़कीर-ए-नजर-ए-शागिर्दी। बाद उसके दो हुंडिया सौ-सौ रुपए की बाद चार-चार,पाँच-पाँच महीने के आईं। मअ़ मीर अहमद हुसैन के सिले के रुपयों के चार सौ और उसके अलावा तीन सौ, और यह कि चार सौ या तीन सौ कितने दिन में आए इनका हिसाब कंवर साहिब की उमर पर हवाला है।
 
अगर वह दो बरस के हैं तो दो बरस में और अगर वह तीन बरस के हैं तो तीन बरस में। हाँ साहिब यह वही मीर क़ासिम अली साहिब हैं जो मेरे पुराने दोस्त हैं। परसों या अतरसों जो डाक का हरकारा तुम्हारा ख़त लाया था, वह एक ख़त मीर साहिब के नाम का, कोई मियां हिकमतउल्ला हैं उनका, मेरे मकान के पते से लाया था, वह मैंने लेकर रख लिया है। जब मीर साहिब आ जावें तो तुम उनको मेरा सलाम कहना और कहना कि हज़रत अगर मेरे वास्ते नहीं तो इस ख़त के वास्ते आप दिल्ली आइए।
 
 भाई, तुमने मुझे कौन-सा दो चार सौ रुपए का नौकर या पेंशनदार क़रार दिया है, जो दस-बीस रुपया ‍महीना किस्त आरजू रखते हो। तुम्हारी बातों पर कभी-कभी हँसी आती है। अगर तुम दिल्ली के डिप्टी कलेक्टर या वकील-ए-कंपनी होते, तो मुझको बड़ी मुश्किल पड़ती। बहरहाल, खुश रहो और मुतफ़क्किर न हो। पाँच रुपया महीना पेंशन अँग्रेजी में से किस्त मुक़र्रर हो गया ता अदाए ज़र। इब्तदाए जून सन् 1853 ई. यानी माहे आइंदा से यह किस्त जारी होगी।
बाबू साहिब का ख़त तुम्हारे नाम का पहुँचा। अजब तमाशा है। वह दिरंग के होने से ख़जिल होते हैं और मैं उनके उज्र चाहने से मरा जाता हूँ। ऐ इत्तिफाक़ आज मैंने उनको लिखा और कल राजा के मरने की ख़बर सुनी। वल्लाह बिल्लाह। अगर दो दिन पहले ख़बर सुन लेता तो अगर मेरी जान पर आ बनती, तो भी उनको न लिखता। जयपुर के आए हुए रुपए की हुंडी इस वक्त तक नहीं आई। शायद आज शाम तक या कल तक आ जावे।
खुदा करे वे आबू पहाड़ पर से हुंडी रवाना कर दें, वरना फिर ख़ुदा जाने, कहाँ-कहाँ जाएँगे और रुपया भेजने में कितनी देर हो जाएगी। ख़ुदा करे, जर्र-ए-मसारिफ़ हरदेवसिंह उसी में से मुजरा लें, मेरी कमाल ख़ुशी है और यह न हो तो '25' हरदेवसिंह को मेरी तरफ़ से ज़रूर दें। मुंशी साहिब का एक ख़त हाथरस से आया था। कल उसका जवाब हाथरस को रवाना कर चुका हूँ।

2 मई 1853 ई.

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