Sunday, March 18, 2012

ग़ालिब का ख़त-8

अजब तमाशा है। बाबू साहिब लिख चुके हैं कि हरदेव सिंह आ गया और पाँच सौ रुपए की हुंडी लाया। मगर उसके मसारिफ़ की बाबत उनतीस रुपए कई आने उस हुंडी में महसूब हो गए हैं। सौ मैं अपने पास से मिलाकर पूरे पाँच सौ की हुंडी तुझको भेजता हूँ। 

मैंने उनको लिखा कि मसारिफ़ हरदेवसिंह के मैं मुजरा दूँगा, तकलीफ़ न करो। '25' ये मेरी तरफ़ से हरदेवसिंह के और दे दो और बाक़ी कुछ कम साढ़े चार सौ की हुंडी जल्द रवाना करो। सो भाई, आज तक हुंडी नहीं आई।
मैं हैरान हूँ। वजह हैरानी की यह कि उस हुंडी के भरोसे पर क़र्ज़दारों से वायदा जून के अवायल का किया था। आज जून की पाँचवीं है। वह तक़ाजा़ करते हैं और मैं आज, कल कर रहा हूँ। शर्म के मारे बाबू साहिब को कुछ नहीं लिख सकता।
 
जानता हूँ कि वह सैकड़ा पूरा करने की फिक्र में होंगे। फिर वे क्यों इतना तकल्लुफ़ करें? तीस रुपए की कौन-सी ऐसी बात है? अगर मसारिफ़-ए-हरदेवसिंह मेरे हाँ से मुजरा हुए तो क्या ग़ज़ब हुआ? उनतीस और पच्चीस, चौवन रुपया निकाल डालें बाकी़ इरसाल करें।
लिफ़ाफे़ ख़तूत के जौ मैंने भेजे थे, वह भी अभी नहीं आए। बाईंहमांयह कैसी बात है कि मैं यह भी नहीं जानता कि बाबू साहिब कहाँ पर हैं, पहाड़ पर हैं, या भरतपुर आए हैं? अजमेर आने की तो ज़ाहिरा कोई वजह नहीं है। नाचार कसरत-ए-इंतज़ार से आजिज़ आकर आज तुमको लिखा है। तुम इसका जवाब मुझको लिखा। और अपनी राय लिखो कि वजह दिरंग की क्या है, ज्यादा-ज्यादा।

5 जून 1853 ई. असदुल्ला

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